विक्रम बत्रा | Vikram Batra Biography in Hindi

Vikram Batra Biography in Hindi

विक्रम बत्रा का एक परिचय

  • नाम - विक्रम बत्रा 
  • जन्म - 09 सितम्बर 1974 
  • जन्म-स्थान - पालमपुर, हिमाचल प्रदेश 
  • पिता का नाम - गृधारी लाल बत्रा  
  • माता का नाम - कमलकान्ता बत्रा 
  • पद - कैप्टन 
  • मृत्यु - 07 जुलाई, 1999 
  • सम्मान - परमवीर चक्र  

लहराते तिरंगे के पीछे आऊँगा या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा - विक्रम बत्रा 


कारगिल युद्ध का हीरो तथा भारतीय सेना का वीर योद्धा विक्रम बत्रा जिसने दुश्मनों के दाँत खट्टे कर दिए एवं मरते-मरते भी अपने कई साथियों को जीवन दान दे गए। इस महान पराकर्मी को मरणोपरान्त परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। विक्रम बत्रा के अदम साहस के बारे में आर्मी चीफ बताते हुए कहते है - " भारत माँ का वीर पुत्र विक्रम बत्रा अगर जीवित वापस लौटता तो निश्चित तौर पर उसे आर्मी हेड बनाया जाता "  


विक्रम बत्रा की प्रारंभिक जीवन 

भारत माँ के वीर सपूत का जन्म 09 सितम्बर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। जी. एल. बत्रा और कमलाकांत बत्रा इस महान हस्ती के माँ-बाप थे। विक्रम जुड़वा भाई थे। माँ-बाप ने इन दोनों का नाम लव और कुश रखा था। जो बाद में लव यानि विक्रम तथा कुश यानि विशाल नाम पड़ा। विक्रम बत्रा की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके घर पर हुई और उनके गुरु थी उनकी माँ कमलाकांत बत्रा। बाद में विक्रम बत्रा की दाखिला डीएवी स्कूल में हो गई।

पालमपुर के सेना छावनी में सेन्ट्रल स्कूल था जिसकी पढ़ाई और अनुशासन के चर्चे पुरे हिमाचल प्रदेश में थी। यह अनुशासन विक्रम बत्रा को काफी आकर्षित करती थी। बाद में विक्रम की भी दाखिला सेंट्रल स्कूल में हो गया। यहाँ विक्रम बत्रा को अनुशासन के साथ-साथ देशप्रेम भी सिखने को मिला। विक्रम बचपन से ही खेलकूद में काफी तेज थे वो अपने स्कूल में  टेबल टेनिस में सबसे अच्छे खिलाड़ी थे। विक्रम बत्रा आगे की पढाई के लिए चंडीगढ़ चले गए। वहां पर उनकी एडमिशन डीएवी कॉलेज, चण्डीगढ़ साइंस विभाग में हो गया। कॉलेज से ही विक्रम बत्रा NCC से जुड़ गए।

विक्रम को हमेशा से ही सेना की अनुशासन काफी आकर्षित करती थी। वो NCC के सर्वश्रेस्ठ कैडर से सम्मानित किया गया। कॉलेज से निकलते ही विक्रम बत्रा ने संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा (CDS) की तैयारी करने लगे। इसी दौरान विक्रम बत्रा की नौकरी मर्चेन्ट नेवी में हो गई लेकिन विक्रम के दिल में देश प्रेम की ज्वार मचल रहा था जिसके चलते उन्होंने नौकरी को ठुकरा दी। 

विक्रम बत्रा की सैन्य जीवन 


Vikram Batra Biography in Hindi
भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद विक्रम बत्रा 
कॉलेज के बाद विक्रम बत्रा का सिलेक्शन CDS के जरिए आर्मी में हो गया। उन्हें ट्रैनिंग के लिए देहरादून भेज दिया गया। ट्रैनिंग खत्म होने के बाद 06 दिसंबर 1997 को उनकी पहली पोस्टिंग जम्मू के सोपोर में हुआ। कारगिल युद्ध के दौरान जून 1999 में उन्हें हम्पी और राकी नाम के जगह को कब्ज़ा के लिए जाने वाले टुकड़ी के साथ भेजा गया। विक्रम बत्रा ने इन टीलों पर भारतीय ध्वज लहराने में काफी अहम् भूमिका निभाई। विक्रम बत्रा की बहादुरी को देखते हुए इंडियन आर्मी ने उन्हें प्रोमोट करते हुए कैप्टन बना दिया। 

Vikram Batra Biography in Hindi
5140 पॉइंट पर कब्ज़ा करने के बाद साथियों के साथ विक्रम बत्रा 
श्रीनगर-लेह मार्ग पर एक महत्तपूर्ण चोटी 5140 पर पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्ज़ा कर रखा था। यह चोटी ऐसी थी की यहाँ से कोई एक पत्थर का टुकड़ा भी गोली के समान आती थी। इसकी महत्ता को देखते हुए आर्मी ने अपने शेर विक्रम बत्रा को इस चोटी पर भारतीय ध्वज फ़ैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी। इस मिशन में विक्रम बत्रा का कोड नेम शेरशाह दिया गया।

विक्रम बत्रा के एक कहानी मशहूर है पाकिस्तानी सैनिक ऊपर से चिल्लाते हुए बोले 'हमें माधुरी दीक्षित दे दो हम तुम्हारी जान बक्श देंगे' ये सुनकर विक्रम बत्रा मुस्कुराते हुए अपने AK-47 से फायर करते हुए बोले 'लो माधुरी दीक्षित का प्यार', विक्रम अपने साथियों की मदद से 20 जून 1999 को 5140 पॉइंट पर सुबह 3 बजे भारतीय तिरंगे को लहरा कर फ़तेह का ऐलान कर दिया। 

कैप्टन विक्रम बत्रा ने चोटी 5140 पर कब्ज़ा करने के बाद विक्रम ने रेडिओ पर देश सम्बोधित करते हुए 'दिल मांगे मोर' का नारा दिया जिसके कारण भारत में विक्रम काफी लोकप्रिय हो गए। इस विजय ने सेना का विश्वास विक्रम बत्रा और बढ़ गया। विक्रम को एक और दुर्गम चोटी 4875 को दुश्मनों के कब्जों से छुड़वाने का जिम्मा दिया। पॉइंट 4875 की ऊंचाई समुद्री लेवल से 17,000  फीट की ऊंचाई के साथ 80 डिग्री की चढ़ाई पर था। जिसके कारण इसपर चढाई करना काफी मुश्किल था। 

07 जुलाई 1999 की सुबह विक्रम के पैरो के पास एक गोला आकर फट गया जिससे विक्रम बत्रा बुरी तरह घायल हो गए, इतना ही नहीं पाकिस्तानी सैनिकों ने इनके टुकड़ी पर गोलाबारी शुरू कर दी। घायल अवस्था में भी विक्रम अपने साथिओं को बचाने में लग गए।

विक्रम के साथी नवीन बताते हैं - विक्रम आखिरी वक़्त में भी यह चिल्लाते सुने गए की मैं दुश्मनों की गोलिओं का सामना करता हूँ आप बाल-बच्चें वाले हो आप बचो मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है ' आखिरी साँस तक दुश्मनों की गोलियाँ का सामना करते हुए शहीद हो गए। 

विक्रम बत्रा परम वीर चक्र से सम्मानित होने वाले आखिरी व्यक्ति है। अदम्य साहस और पराक्रम के लिए 15 अगस्त 1999 को उनके मरणोपरान्त परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। विक्रम जैसे वीर की इस धरती को हमेशा जरुरत रहेगी।