सुभाष चन्द्र बोस | Subhash Chandra Bose Biography in Hindi

Subhash Chandra Bose Biography in Hindi
सुभाष चन्द्र बोस 

सुभाष चन्द्र बोस का एक परिचय 

  • नाम - सुभाष चंद्र बोस 
  • जन्म - 23 जनवरी 1897 
  • जन्म स्थान - कटक, ओड़िशा 
  • पिता का नाम - जानकीनाथ बोस 
  • माता का नाम - प्रभावती 
  • पत्नी का नाम - एमिली शेंकल 
  • बच्चें - अनीता बोस फाफ 
  • पार्टी - भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस 
  • संगठन - आजाद हिन्द फ़ौज 
  • उपाधी - नेताजी 
  • मृत्यु - 18 अगस्त 1945 (जापान सरकार के अनुसार )


अपनी शब्दों से लोगों के खून में उबाल लाने वाले कॉंग्रेस के अग्रणी नेता सुभाष चन्द्र बोस जिन्हें प्यार से लोग "नेताजी" बुलाते थे। सुभाष चंद्र बोस का मानना था हमें अंग्रेजों से आजादी छीन कर लेनी चाहिए इसके लिए हमे अगर उनसे युद्ध भी करना पड़े तो हम पीछे न हटेंगें। सुभाष चंद्र बोस मात्र 24 साल के उम्र में भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस जॉइन की थी। सुभाष चंद्र बोस कॉंग्रेश के गरम दल के सबसे अग्रीण नेता थे। भारतवासिओं में एक समय ये महात्मा गाँधी से भी ज्यादा प्रिय थे। मात्र 43 साल के उम्र में वो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे लेकिन महात्मा गाँधी के नापसंदी के कारण उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया था । 

द्वितीय विश्व युद्ध के समय अपनी एक अलग संगठन आजाद हिन्द फ़ौज बनाकर अंग्रेजो के दाँत खट्टे कर दिए थे। आज़ादी के बाद 1956 में जब तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड केलेमेन्ट एटली जो इंडिया इंडिपेंडेस एक्ट पर हस्ताक्षर किये थे वो भारत आये तब बंगाल के राज्यपाल चक्रवर्ती ने उनसे पूछा "विनम्रता से आपसे पूछना चाहता हूँ जब 1944 में भारत छोड़ो आल्दोलन एक तरह से फेल हो चुका था तब आपके सामने ऐसी क्या परस्तिथि आ गई थी जो आप भारत छोड़ कर चले गए " इसका जबाब उन्होंने सिर्फ तीन शब्दों में दी - सुभाष चन्द्र बोस। 


सुभाष चंद्र बोस का बचपन 


नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक उड़ीसा में हुआ था। सुभाष चंद्र बोस के पिताजी का नाम जानकीनाथ बोस था तथा इनकी माता का नाम प्रभावती था।  जानकीनाथ बोस सरकारी वकील थे जो बाद में बंगाल विधानसभा के सदस्य बने। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें रायबहादुर का ख़िताब से नवाजा था। सुभाष चंद्र बोस कुल 14 भाई-बहन थे। सुभाष चंद्र बोस अपने माता पिता के 9वें सन्तान थे। सुभाष चंद्र बोस भाई में पाँचवे थे।  सुभाष चंद्र बोस को अपने भाई में सबसे अधिक लगाव अपने दूसरे बड़े भाई शरद चंद्र से थी। 


सुभाष चन्द्र बोस की शिक्षा-दीक्षा 


सुभाष चन्द्र बोस की प्रांभिक शिक्षा-दीक्षा कटक के प्राइमरी स्कूल प्रोटेस्टेण्ड में हुई। उनकी आगे की पढाई के लिए उन्होंने रेनेवेशा स्कूल ज्वाइन किया। मात्र पंद्रह साल की आयु में सुभाष ने विवेकानंद का पूरा अध्ययन  कर लिया जिसके कारण वो स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित हो गए। स्नातक की पढाई के लिए उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज ज्वाइन की। एक बार उनके कॉलेज में प्रोफेसरों और छात्रों के बीच विवाद हो गया। तब सुभाष चंद्र बोस ने छात्रों के समूह का नेतृत्व किया जिसके कारण उन्हें प्रेसिडेंसी कॉलेज से निकाल दिया गया और उनके परीक्षा में बैठने पर पाबन्दी लगा दिया गया।

सुभाष चंद्र बोस ने बंगाल रेजीरमेंट में भर्ती होने के लिए इम्तिहान दिया लेकिन उनके आँखे खराब होने के कारण उनका फाइनल सेलेक्शन सेना में नहीं हो पाया। यह वो समय था जब सुभाष चंद्र बोस को सेना के प्रति और लगाव को बढ़ा दिया। आगे की पढाई के लिए सुभाष का दाखिला स्कॉटिश चर्च कॉलेज में हो गया। लेकिन सुभाष के मन से सेना में जाने का विचार अभी तक गया नहीं था इसबार उन्होंने टेरिटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रँगरूट में दाखिला मिल गया। सुभाष चंद्र बोस  ने अपने लगन-परिश्रम से 1919 में दर्शनशास्त्र की फाइनल परीक्षा में पुरे कलकत्ता यूनिवर्सिटी में दूसरा स्थान हासिल किया। 

सुभाष चंद्र बोस के पिता जानकीनाथ सुभाष के कॉलेज परिणाम से काफी प्रभावित हुए। सुभाष चंद्र बोस की सेना में जाने की इक्षा को देखते हुए उन्होंने फैसला किया की सिविल सेवा की पढाई सुभाष इंग्लॅण्ड जा कर करेगा। माता-पिता की आज्ञा का सम्मान करते हुए सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी चले गए। सुभाष चंद्र बोस अपनी परिश्रम से सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ली।

स्वामी विवेकानंद और अरविन्द घोस के विचारों से प्रभावित सुभाष चंद्र बोस अपनी सिविल सेवा की उम्मीदवारी को त्याग दिया और भारत वापस लौट आये। सुभाष चंद्र बोस की इस फैसला से इनके माता-पिता काफी दुखी हो गए, पिताजी ने सुभाष से बोले उनकी इच्छा है की वो आईसीएस (ICS) बने। सुभाष चन्द्र बोस पिताजी की इच्छा को जानने के बाद सोच में पड़ गए। सोचने के लिए सुभाष ने 24 घंटे का टाइम माँगा। काफी सोच विचार कर सुभाष चन्द्र बोस ने आईसीएस की परीक्षा देने का निर्णय किया और 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैंड वापस चले गए। 1920 में आईसीएस के एग्जाम में सुभाष चंद्र बोस का चौथा स्थान आया।  

सुभाष चंद्र बोस का अंतरात्मा अंग्रेजो की गुलामी की इजाजत नहीं दे रही थी। आख़िरकार सुभाष चंद्र बोस ने  फैसला किया की वो अंग्रेजों का नौकर नहीं बनेंगे और आईसीएस से इस्तीफा देकर भारत वापस लौट आये। घर आने पर सुभाष ने अपनी मन की व्यथा पाने माता-पिता को बतलाई, तब इनके पिता ने कहा "जब तुमने देशसेवा करने का प्रण ले लिया है तो लाख कठिनाइयाँ आ जाये पीछे मत हटना " . माता प्रभावती ने सुभाष चंद्र बोस का हौसला बढ़ाते हुए बोली "मुझे अपने बेटे पर गर्व है" . 


सुभाष चंद्र बोस का सक्रिय राजनीती में आना 

Subhash Chandra Bose Biography in Hindi
सुभाष चंद्र बोस 

सुभाष चंद्र बोस बंगाल कैडर के सभी शीर्ष नेताओ से मुलाकात की, देशबंधु चित्ररंजन दास के साथ काम करने की सुभाष की बहुत इच्छा थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सुभाष को सलाह दी की वो महात्मा गाँधी से जा कर मिले। उस वक्त गांधीजी बंबई में रहते थे। महात्मा गाँधी से सुभाष की मुलाकात 20 जुलाई 1921 को मणिभवन में हुई। सुभाष गाँधी जी से काफी प्रभावित हुए और उनके सलाह पर कलकत्ता लौट आये और दासबाबू के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ संगठन को मजबूत करने में लग गए। 

सन 1922 में गाँधीजी ने अँग्रेजों के ख़िलाफ़ पुरे देश में असहयोग आलदोलन का बिगुल फूंक रखी थी। सुभाष चंद्र बाबू दासबाबू  के साथ मिलकर कलकत्ता में अल्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। दासबाबू ने बंगाल में स्वराज पार्टी की स्थापना की। विधानसभा में अंग्रेजो को पुरजोर रूप से विरोध करने के लिए स्वराज पार्टी ने कोलकाता महापालिका का चुनाव लड़ा और स्वराज पार्टी चुनाव जीतकर दासबाबू कोलकाता का महापौर बन गए।

दासबाबू ने सुभाष चंद्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बना दिया। सुभाष ने कोलकाता महापालिका का काम कार्य करने का पूरा तरीका ही बदल दिया। सुभाष चंद्र बोस ने सभी रास्तों का नाम अंग्रेजो के नाम से बदल कर भारतीयों के नाम से रख दिया। स्वतंत्र संग्राम के शहीद के परिवारों को सुभाष चंद्र बोस ने महापालिका में नौकरी में भर्ती करना शुरू कर दिया। उनके इस कार्य से पुरे देश में उनकी प्रशंसा होने लगी। 

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जवाहरलाल नेहरू के साथ सुभाष चन्द्र बोस 
बहुत जल्द सुभाष चन्द्र बोस देश के लोकप्रिय नेता बन चुके थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस के ख्यालात काफी मिलते थे दोनों ने साथ मिलकर युवाओं की इंडिपेंडेन्स लीग शुरू कर दी। गांधीजी तबतक सक्रिय राजनीती से दुरी बनाए हुए थे। 1927 में भारत में साइमन कमीशन भारत आया तब कलकत्ता में कमीशन को काले झंडे दिखाने वालों का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस ने किया। सन 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ जिसकी अध्यक्षता मोती लाल नेहरू ने की। इस अधिवेशन में सुभाष ने खाकी वस्त्र धारण करके सैन्य सिपाही की तरह मोती लाल को सलामी दिया। 

जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस पूर्ण स्वराज के पक्षधर ने जबकि गाँधी जी इसके खिलाफ थे। लेकिन दोनों ने स्पष्ट तौर पर गांधीजी को अवगत करा दिया उन्हें पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी मंजूर नहीं। महात्मा गाँधी ने तब सुझाव दिया की पहले हम अंग्रेज से डोमिनियन स्टेटस की माँग करेंगे उसके एक साल बाद पूर्ण स्वराज का मुद्दा उठायेंगे।

नेताजी और नेहरू ने भारी मन से गाँधीजी को सहमति दे दी लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने डोमिनियन स्टेटस देने से साफ तौर पर मना कर दिया। 1930 में कोंग्रेश की वार्षिक अधिवेशन लाहौर में हुई और इसके अध्यक्ष थे पंडित जवाहर लाल नेहरू। इस बार नेहरू ने स्पष्ट तौर पर घोसना कर दी की हमे पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी मंजूर नहीं और 26 जनवरी को स्वतंत्रा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।


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कांग्रेस लाहौर अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस 
26 जनवरी 1931 को जब राष्ट्र ध्वजारोहण कर सुभाष चंद्र बोस विशाल रैली का नेतृत्व कर रहे थे तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। ध्वजारोहण के आरोप में देश भर में बड़े-बड़े नेता सहित हजारों देश भक्तों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। तब गांधीजी ने अंग्रेज़ो से समझौता कर सबको जेल से रिहा करवाया। लेकिन भगत सिंह सहित उनके साथिओ को रिहा करने से अंग्रेजों ने साफ इंकार कर दिया। इस बात से सुभाष महात्मा गाँधी से काफी नाराज हो गए। उनका मानना था गाँधीजी ने पुरजोर तरीके से उनकी रिहाई की माँग नहीं रखी। इस मुद्दे पर सुभाष को कांग्रेस पार्टी के किसी भी बड़े नेता का समर्थन न मिला।


सुभाष चंद्र बोस का यूरोप भ्रमण  


सन 1932 में सुभाष चंद्र बोस को फिर से गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया गया। अल्मोड़ा जेल में उनकी तबियत बहुत खराब हो गया तब डॉक्टरों के सलाह पर ब्रिटिश सरकार ने इन्हे इलाज के लिए यूरोप जाने की इजाजत दे दिया। सुभाष इस दौरे का भरपूर फ़ायदा उठाना चाहते थे। सुभाष इटली में जाकर मुसोलिनी से मिले और भारत की आजादी दिलाने में उनसे सहायता की माँग की। 

आयरलैंड से भी भारत की सहायता के लिए वचन सुभाष ने ले लिया। यूरोप भ्रमण के दौरान उन्हें खबर मिली की ऑस्ट्रिया में पंडित नेहरू की पत्नी कमला नेहरू का निधन हो गया, ये सुनते ही नेताजी वहाँ से नेहरूजी से मिलने आस्ट्रिया पहुँच गए। सन 1934 में सुभाष चंद्र बोस को खबर मिली की उनके पिताजी अंतिम अवस्था में है तो सुभाष कराची होते हुए कोलकाता लौट आये लेकिन ब्रिटिश हुकूमत उन्हें फिर से गिरफ्तार कर वापस यूरोप भेज दिया। सुभाष चंद्र बोस 1933 से 1936 तक कई देशों में घूम-घूम कर यूरोप में भारत के मित्र राष्ट्र तलाशते रहे।  


   

कोंग्रेस अध्यक्ष पद की ताज़पोशी 

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हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गाँधी के साथ नेताजी 
सन 1938 में कांग्रेस का 51वा राष्ट्रीय अधिवेशन हरिपुरा में हुआ। इस अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने अध्यक्ष पद के तौर पर सुभाष चंद्र बोस का नाम आगे किया। जिसे सर्वसहमति से मान लिया गया। अधिवेशन में सुभाष ने अपने भाषण से कांग्रेस नेताओं में जोश भर दिया। अपने अध्यक्ष रहते हुए कई बड़े-बड़े कामों को सुभाष चंद्र बोस ने सम्पन किया।

सुभाष चंद्र बोस ने पहले योजना आयोग की स्थापना की और इसका अध्यक्ष अपने परम मित्र पंडित जवाहर लाल नेहरू को बनाया। इसके अलावा बंगलौर में मशहूर वैज्ञानिक सर विश्षेरैया के अध्यक्षता में एक विज्ञान परिषद का गठन किया। कुछ ही दिनों में सुभाष चंद्र बोस लोकप्रिय नेता बन गए। उनका ब्रिटिश हुकूमत के प्रति अत्यधिक आक्रमक था।

सुभाष जल्द  से जल्द भारत को अंग्रेजो के चंगुल से छुड़ाना चाहते थे। पुरे विश्व पर द्वितीय विश्व युद्ध के काले बादल मड़रा रहे थे। सुभाष एक कुशल राजनीतिक के तरह इस समय का लाभ उठा कर अंग्रेजो को यहाँ से भागने की योजना बनाने लगे। सुभाष चंद्र बोस चाहते थे की जब इंग्लैंड द्वितीय विश्व युद्ध में उलझा रहेगा तभी हम यहाँ आल्दोलन कर उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर देंगे। लेकिन उनका ये तरीका महात्मा गाँधी को नहीं भा रहा था। गाँधीजी अहिंसा के पुजारी थे उन्हें परेशानिओ से घिरे शत्रु पर और प्रहार करना उनके सिद्धांतो के खिलाफ लग रहा था।


कॉंग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा  


महात्मा गाँधी चाहते थे की जल्द से जल्द सुभाष चंद्र बोस को कॉंग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया जाए जबकि सुभाष चाहते थे की उन्हें एक और मौका अध्यक्ष पद के लिए मिले। 1939 में कॉंग्रेस अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने कॉंग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभि सीतारमैया का नाम आगे कर दिया। तब कॉंग्रेस के कई दिग्गज नेता सुभाष को ही अध्यक्ष पद पर बनाये रखने का निवेदन किया लेकिन गाँधी नहीं माने। इतना ही नहीं गाँधीजी ने ये ऐलान कर दिया सीतारमैया की हार मेरी हार होगी। महत्मा गाँधी के जिद पर पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ। लोगों का अनुमान था सीतारमैया आसानी से जीत जायेंगे क्योंकि उन्हें गाँधीजी का समर्थन प्राप्त है लेकिन परिणाम चौंकाने वाला था।

सुभाष चंद्र बोस ने सीतारमैया को 203 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया था। ये जीत स्पष्ट संकेत था नेताजी सिर्फ लोगों के ही लोकप्रिय नेता नहीं है बल्कि कांग्रेस संगठन के अंदर उनसे बड़ा कोई नेता नहीं। लेकिन इसे अपना सम्मान का प्रश्न बना लिया और साफ तौर पर बता दिया उन्हें सुभाष चंद्र बोस का काम काज के तरीको से घोर आपत्ति है। अगर सुभाष कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बना रहेगा तो वो कॉंग्रेस छोड़ देंगे।

महत्मा गाँधी के समर्थन में कॉंगेस कारकारणी के 14 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सुभाष चंद्र बोस को अपने परम मित्र पंडित जवाहर लाल से उम्मीद थी को वो उनका साथ देंगे लेकिन नेहरूजी खामोश रहे। महात्मा गाँधी ने कांग्रेस अधिवेशन से दुरी बना ली। कॉंग्रेस के अंदर हो रहे खींचतान से छुब्ध हो कर सुभाष चंद्र बोस ने 29 अप्रैल 1939 को कांग्रेस पद से इस्तीफा दे दिया।



फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना 


सुभाष चंद्र बोस ने ठान लिया था वो भारत को गुलामी के जंजीर से मुक्त करा के रहेंगे। 3 मई 1939 को नेताजी ने कॉंग्रेस पार्टी के अंदर ही फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना कर दी। पार्टी के खिलाफ गतिविधिओ का आरोप लगा कर उन्हें कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। सुभाष चंद्र बोस ने फैसला किया की उनकी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक द्वितीय विस्वयुद्ध के दौरान पुरे देश में आलदोलन करेंगे अंग्रेजों का पैर उखाड़ देंगे।

फॉरवर्ड ब्लॉक कम ही समय में युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गई। लोग तेजी से पार्टी से जुड़ने लगे। सितम्बर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी और इंग्लैंण्ड के बीच युद्ध छिड़ गया। इस मौका का फ़ायदा उठाने के लिए सुभाष ने कांग्रेस अधिवेशन के सदस्यों को आमंत्रित किया, उनसे इंग्लैंड पर दबाब बनाने की रणनीति पर चर्चा की लेकिन कांग्रेस सदस्यों  के तरफ से कोई सहायता मिलने का आश्वासन नहीं मिला।

जुलाई 1940 में कलकत्ता में गुलामी के प्रतीक चिन्ह हालवेट स्तम्भ को फॉरवर्ड ब्लॉक के युवा बिग्रेड ने ध्वस्त कर दिया। इसके माध्यम से सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश हुकूमत को सन्देश दिया की हालवेट स्तम्भ की तरह अंग्रेजों के शासन को ध्वस्त कर देंगे। नेताजी के इस धमकी के बाद अंग्रेज सरकार की नींद उड़ गई, फॉरवर्ड ब्लॉक के बड़े नेताओ को गिरफ्तार किया जाने लगा। सुभाष चंद्र बोस को गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया। सुभाष की तबीयत जेल में काफी खराब हो गई, उनके स्वास्थ्य को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें घर में ही नजरबन्द कर दिया।


हिटलर से मुलाकात 


सुभाष चंद्र बोस ने नजरबन्द के दौरान पुलिसवालों को चकमा देकर पेशावर के रास्ते काबुल पहुंच गए। काबुल में नेताजी ने इटालियन दूतावास की सहायता से इटालियन नागरिक बन कर रूस की राजधानी मास्को पहुँच गए। वहाँ से सुभाष जी जर्मनी की राजधानी बर्लिन पहुँच गए।

सुभाष चन्द्र बोस का मानना था की दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है और हमें इंग्लैंड के प्रति जर्मनी की दुश्मनी का हमे फायदा उठानी चाहिए। इसी के तहत नेताजी ने जर्मनी में हिटलर से 29 मई 1942 को मुलाकात की। लेकिन हिटलर ने भारत के सहयोग में कोई रूचि नहीं दिखलाई। हिटलर ने सुभाष चंद्र बोस को सलाह दी की भारत जापान से करीब हैं आपको उनसे सहायता लेनी चाहिए।


आजाद हिन्द फ़ौज का गठन 


8 मार्च 1943 को जर्मनी के कील बन्दरगाह होते हुए जापानी पनडुब्बी की सहायता से इंडोनेशिया के पादांग बंदरगाह तक पहुँच गए। सिंगापुर में सुभाष चंद्र बोस को रासबिहारी बोस का सर्वप्रथम साथ मिला। रासबिहारी ने अपनी पार्टी स्वनतंत्रा परिसद का नेतृत्व नेताजी के हाथों में सौप दिया।

सुभाष चंद्र बोस वहाँ से जापान के लिए रवाना हो गए। जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो से मुलाकात की, नेताजी से मुलाकात के बाद जापानी प्रधानमंत्री काफी प्रभावित हुए। उन्होंने नेताजी को मदद का आश्वाशन दिया। कुछ दिनों के बाद जापानी सदन डायट में नेताजी ने एक जोरदार भाषण दिया।


21 अक्टूबर 1943 के दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आर्जी-हुकूमते-आजाद-हिन्द की स्थापना की। यह स्वाधीन भारत का अंतरिम सरकार थी जिसके राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री स्वमं नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। इस सरकार को जापान सहित नौ देशों ने मान्यता प्रदान की।


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आजाद हिन्द फ़ौज के तैयारिओं का जायजा लेते हुए नेताजी 
नेताजी आजाद हिन्द फ़ौज के प्रधान सेनापति भी थे इन्होने अपनी फ़ौज में भर्ती शुरू कर दी। आजाद हिन्द फ़ौज में औरतो के लिए भी एक रेजीरमेंट था जिसका न नाम झाँसी की रानी रेजीरमेंट था और इसकी मुख्य सेनापति लक्ष्मी स्वामिनंधन थी। पूर्वी एशिया में बड़े पैमानों पर आजाद हिन्द फ़ौज में सेना की भर्ती शुरू हो गई। नेताजी ने सेना में भर्ती होने और आर्थिक मदद देने  के लिए जोरदार भाषण देते हुए आवाहन किया "अब हमारी आजादी निश्चित हैं, लेकिन आजादी खून माँगती है, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा " .

जापानी सेना की सहायता से आजाद हिन्द फ़ौज ने भारत पर आक्रमण कर दिया। अपनी सेना को प्रेरित करते हुए नेताजी ने "दिल्ली चलो" का नारा दिया। आजाद हिन्द फ़ौज ने जापान सेना के साथ मिलकर अंडमान निकोबार द्वीप को अंग्रेज से जीत ली। जीत से उत्साहित दोनों सेना ने इम्फाल और कोहिमा पर आक्रमण कर दिया लेकिन अंग्रेजो ने यहाँ दोनों सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।


नेताजी की मृत्यु का रहस्य 


6 जुलाई 1944 को सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द रेडिओ पर महात्मा गाँधी के नाम सन्देश जारी किया और अपने फ़ौज के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएं माँगी। पहली बार नेताजी ने महात्मा गाँधी को "राष्ट्रपिता" कह कर सम्भोधित किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की हार से काफी धक्का लगा। नेताजी को अब जापान से सहायता की ज्यादा उम्मीद नहीं थी। भारत की आजादी के लिए नेताजी ने फैसला किया की वो रूस से मदद लेंगे। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई मार्ग से मंचुरिया की तरफ जाने के दौरान दुर्घटना ग्रस्त हो गई। उसके बाद  नेताजी को नहीं  देखा गया।


यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बन कर रह गया क्योंकि कई रिपोर्ट में दावा किया गया की 18 अगस्त 1945 को कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं। कुछ लोग फ़ैजाबाद में गुमनामी बाबा को ही सुभाष चंद्र बोस मानते थे। सच तो ये है ऐसे देश भक्त कभी मरते नहीं है वो हमेशा लोगो के दिल पर राज करते है। सुभाष चंद्र बोस की राजनीती, विदेशनीति और युद्धनीति में कोई सानी न हुआ है और न आगे कोई होगा।

!! जय हिन्द !!  

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