मोतीलाल नेहरू | Motilal Nehru Biography in Hindi

Motilal Nehru Biography in Hindi
मोतीलाल नेहरू 

मोतीलाल नेहरू का एक परिचय 

  • पूरा नाम - मोतीलाल नेहरू 
  • जन्म तिथी - 06 मई 1861 
  • जन्म स्थान - आगरा 
  • पिता का नाम - गंगाधर नेहरू 
  • माता का नाम - जणूरानी देवी 
  • पत्नी का नाम - स्वरुप रानी 
  • पुत्र का नाम - जवाहर लाल नेहरू 
  • पुत्री का नाम - विजयलक्ष्मी नेहरू 
  • पार्टी का नाम - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा स्वराज पार्टी 
  • पद - कॉंग्रेस अध्यक्ष (1919, 1928)
  •  मृत्यु - 06 फ़रवरी 1931 ( 69 वर्ष की आयु में )

इलाहाबाद के प्रसिद्ध वकील और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पिता मोतीलाल नेहरू का जन्म आगरा में 06 मई 1861 को हुआ था। मोतीलाल नेहरू के पिता का नाम गंगाधर नेहरू और माता का नाम जणू रानी देवी था। मोतीलाल नेहरू के पिताजी दिल्ली के आख़िरी कोतवाल थे। मोतीलाल नेहरू अपने चार भाई-बहनों में तीसरे थे। मोतीलाल अपने बड़े भाई नन्दलाल नेहरू से काफ़ी प्रभावित थे। वो उन्हीं की तरह प्रसिद्ध वकील बनना चाहते थे। मोतीलाल नेहरू की शादी स्वरूप देवी से हुई थी जिनसे इन्हें तीन संताने प्राप्त हुए। पण्डित जवाहर लाल नेहरू सबसे बड़े संतान थे। दो बेटियाँ थी जिनका नाम था - विजयलक्ष्मी और कृष्णा। 

Motilal Nehru Biography in Hindi
मोतीलाल नेहरू अपने बेटे और पत्नी के साथ 
मोतीलाल नेहरू के बड़े भाई ने नन्दलाल नेहरू ने इनके पढ़ाई की सारे जिम्मेदारी उठा रखी थी। मोतीलाल पढ़ने में बहुत तेज़ थे। मोतीलाल नेहरू ने अपने बड़े भाई से उनके तरह वकील बनने की इक्छा जताई। लेकिन स्नातक के अंतिम साल के इम्तेहान में किसी कारण से मोतीलाल नेहरू की इम्तेहान छुट गई। इसके बाद वकालत की पढ़ाई में मोतीलाल नेहरू ने मेहनत कर के पुरे विश्व विद्यालय में अव्वल आए। सभी इनके कुशाग्र बुद्धि के कायल थे। 


मोतीलाल नेहरू का कैरियर  

वर्ष 1883 में मोतीलाल नेहरू ने अपना वकालत की कैरियर कानपुर से आरम्भ किया। बाद में मोतीलाल नेहरू अपनी वकालत की प्रैक्टिस इलाहबाद में करने लगे। कुछ ही दिनों में मोतीलाल इलाहबाद के प्रसिद्ध वकील बन गए। इन्होंने अपनी वकालत से काफी पैसे कमाए। मोतीलाल नेहरू को अंग्रेजों का रहन सहन काफी पसन्द था। इन्होने इलाहबाद सिविल लाइन में एक बड़ा सा मकान खरीदा। कई बार यूरोप देशों का दौरा करने के बाद मोतीलाल नेहरू ने पूरी तरह से अपनी जीवन शैली को पश्चिम सभ्यता में ढाल लिया। 

वर्ष 1909 में इंग्लैंड के प्रिवी कॉउंसिल में वकील के लिए मोतीलाल नेहरू के नाम का अनुमोदन हुआ। यह पद किसी बड़े सम्मान से कम नहीं था। वर्ष 1910 में मोतीलाल नेहरू ने संयुक्त प्रान्त की चुनाव में जीत हासिल कर एक बहुत बड़ा मुकाम हासिल किया। कहा जाता हैं की मोतीलाल नेहरू तात्कालिक सर्वश्रेस्ठ वकील थे भारतवर्ष के। 


स्वतंत्रा आल्दोलन में मोतीलाल नेहरू का योगदान  

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मोतीलाल नेहरू स्वतन्त्रा सेनानियों के साथ 
वर्ष 1916 में भारतवर्ष में एक महात्मा का आगमन हुआ जिसने अपने विचार से पुरे भारतवर्ष की दिशा ही बदल कर रख दी उनका नाम था - महात्मा गाँधी। महात्मा ने भारतवर्ष के लोगों के आशा के अनुरूप चम्पारण सत्याग्रह तथा खेड़ा सत्याग्रह को सफल कर के लोगों में नई आशा का संचार कर दिया था।

महात्मा के विचारों से प्रभावित होकर भारतवर्ष के महान लेखक, वकील, जमींदार, छात्र तथा किसान जुड़ने लगे। गाँधी के विचार से मोतीलाल नेहरू बिना प्रभावित हुए न रह पाए। उन्होंने अपनी वकालत को छोड़ कर गाँधी के साथ जुड़ गए। अपने आनंद भवन को कांग्रेस को सौपते हुए एक आल्दोलन की विशेष जगह प्रदान की। 

जालियावाला बाग हत्याकाण्ड के बाद भारतवर्ष में एक शून्यता को जन्म दिया। यही प्रश्न कांग्रेस के सामने खड़ी थी इस मुश्किल वक़्त में कांग्रेस का बागडोर कौन संभालेगा तब मोतीलाल आगे आये। वर्ष 1919 अमृतसर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। इन्होंने गांधीजी के आवाहन पर स्वदेशी अपनाते हुए पूरी तरह से पश्चिम सभ्यता को त्याग दिया।

ब्रिटिश हुकूमत के जालियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के बनाये जाँच समिति को नकारते हुए स्वम जाँच कमिटी बनाई जिसके सदस्य मोतीलाल नेहरू के अलावा महात्मा गाँधी और चित्तरंजन दास थे। 

महात्मा गाँधी के असहयोग आल्दोलन में मोतीलाल नेहरू ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। चौड़ा-चौरी हत्याकांड के बाद महात्मा ने आल्दोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया। महात्मा गाँधी के इस फैसले से मोतीलाल नेहरू काफी दुखित हुए और कॉंग्रेस की सदस्यता को त्याग दिया। 

 वर्ष 1923 में मोतीलाल नेहरू ने चित्तरंजन दास के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की। स्वराज पार्टी अंग्रेजी हुकूमत के हर गलत फैसले का जोरदार विरोध विधान सभा में करती थी। वर्ष 1927 में साइरस कमीशन  नियुक्ति हुई। तब मोतीलाल नेहरू को स्वतन्त्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने के लिए बोला गया। इसे साइरस कमीशन का प्रतियात्मक रिपोर्ट माना जाता है। इस रिपोर्ट में भारतीय को तहज़ीज दी गई थी। लेकिन इस रिपोर्ट का विरोध कांग्रेस में ही होने लगी।

पूर्ण स्वराज की माँग करने वाले कोंग्रेसी गुट जिनके नेता मोतीलाल नेहरू के पुत्र पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस थे वो रिपोर्ट के विरोध में अपनी आवाज बुलन्द करने लगे। वर्ष 1928-29 में मोतीलाल नेहरू को एक बार फिर से कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया था। यह वो वक़्त था जब महात्मा गाँधी सक्रिय राजनीति से दूर थे। 


अन्य 
दोबारा कॉंग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद सलामी लेते हुए मोतीलाल नेहरू 

मोतीलाल नेहरू की मृत्यु 

मोतीलाल नेहरू अपनी खराब स्वास्थ के कारण सक्रिय राजनीति से वर्ष 1929 से दूर रहने लगे। सविनय अवज्ञा आल्दोलन में उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया लेकिन ख़राब स्वास्थ को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया गया। 06 फरवरी 1931 को मोतीलाल नेहरू का निधन हो गया। 

मोतीलाल नेहरू आजादी के उन महानायकों में से थे जिन्होंने अपने देश की आजादी के लिए विलासतापूर्ण जीवन को त्याग कर देश सेवा में सब कुछ अर्पण कर दी। इनके त्याग को भुलाया नहीं जा सकता।