छत्रपति शिवाजी महाराज | Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography in Hindi

Chhatrapati Sivaji Maharaj in Hindi
छत्रपति शिवाजी महाराज 


छत्रपति शिवाजी महाराज का एक परिचय 

  • नाम - शिवाजी
  • जन्म - 19 फ़रवरी 1630
  • जन्म स्थान - शिवनेरी दुर्ग, जूनार - पुणे
  • पिता का नाम - शाहजी भोंसले
  • माता का नाम - जीजाबाई
  • राज्याभिषेक - 6 जून 1674
  • शासनकाल - 06 जून 1674 - 03 अप्रैल 1680
  • संतान - सम्भाजी, राजाराम और राणुबाई
  • उपाधि - छत्रपति
  • मृत्यु - 03 अप्रैल 1680 


जो इस भारत की धरती को अपना मानेगा वही इस धरती पर राज्य करेगा उसी को राज्य करने का अधिकार है वही धरती पुत्र है 

भारत के महान योद्धा, मराठों का शान वीर शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 में पुणे के निकट जूनार में शिवनेरी दुर्ग में हुई। शिवाजी के माता-पिता भगवान शिव के परम भक्त थे और उन्ही के नाम पर शिवाजी नामांकरण हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज के पिताजी का नाम शाहजी भोंसले था तथा उनके माता का नाम जीजाबाई था। शिवाजी अपने माँ जीजाबाई के बहुत करीब थे उन्ही के मार्गदर्शन में इनका लालन-पालन हुआ। 

1630 ईस्वी पुरे भारत में मुगलों का परचम लहरा रहा था और अंग्रेज अपनी पकड़ बनाने की कोशिस में थे। तब मुगलों की छोटी मोटी भिड़ंत स्थानीय शासक से होती रहती थी। उत्तर में शाहजहाँ, बीजापुर में सुल्तान मोहम्मद आदिल  साह और गोलकुण्डा में सुल्तान अब्दुला क़ुतुब साह का अधिपत्य था।

डेक्कन सुल्तान सेना के लिए हमेशा मुस्लिमो को ही प्राथमिकता देते थे। बंदरगाहों पर पुर्तग़ालिओ का कब्ज़ा था और थल पर मुगलो का सम्राज्य। दक्कन के राजा को मजबूरन हिन्दू राजाओ को उच्च सैनिक पद पर नियुक्त करना पड़ता था। उन्हीं में से एक शिवाजी के पिता शाहजी भोसले थे। 

शाहजी भोंसले अकसर घर दे दूर ही रहते थे। इसलिए शिवाजी की देखरेख की जिम्मेदारी उनके माता जीजाबाई तथा गुरु दादू कोंडेलदेव पर थी। माता जीजाबाई एक धार्मिक और आध्यत्मिक थी इनसे शिवाजी को भारत के महान इतिहास जानने का मौका मिला तथा रामायण और महाभारत  आध्यत्मिक अध्ययन किया। इनका प्रभाव शिवाजी के जीवन पर काफी हुआ।  गुरु दादू कोंडेलदेव से घुरसवारी, तीरंदाज़ी तथा तलवरजी की कला सीखी। दादू कोंडेल देव का मानना था की शिवाजी अपने पिता की तरह ही सेना में उच्च पदों पर आसीन होंगे।  

छत्रपति शिवाजी की विजय गाथा 


आदिलशाह के शासन से बीजापुर की जनता काफी त्रस्त थी खासकर के किसान और दलित जाति के लोग। एक ऐसे ही इलाका था मवला। मवला, बीजापुर के पश्चिम क्षेत्र में 150 किलोमीटर लम्बा और 30 किलोमीटर चौड़ा इलाका था। यहाँ के युवक काफी परिश्रमी किसान के साथ-साथ कुशल योद्धा थे। लेकिन ये अन्य समाज से काफी कटे हुए थे ये आदिलशाह के अत्याचार से तो छुटकारा चाहते थे लेकिन सेनानायक नहीं होने के कारण वो हाथ पर हाथ धरे रह जाते थे। मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में छत्रपति शिवाजी ने इन सभी लोग की संगठित किया और इन्हे मवला के योद्धा के रूप में तैयार किया। 

सन 1647-४८ में भारत में किसी हिंदू राजा के स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के लिए तीन ही संभावनाएं थी। पहली, वो मुग़ल साम्राज्य के केंद्र से दूर हो। दूसरा, जमीन खेती के लिए भरपुर उपजाऊ हो तथा तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण किला जंगलो से घिरा हुआ हो ताकि गोरिल्ला युद्ध तथा छापामार युद्ध को आसानी से किया जा सके। मवला एक ऐसा ही इलाका था।

शिवाजी मवला के योद्धा के साथ दुर्ग निर्माण में लग गए। इधर बीजापुर मुगलों के आक्रमण से तंग था उनके राज्य में भी छोटे-मोटे आपसी संघर्स भी हो रहे थे। आदिलशाह के बीमारी की खबर मिलने के बाद पुरे सम्राज्य में आरजकता फ़ैल गई। इसी का फायदा उठाकर शिवाजी बीजापुर के दुर्गों पर अधिकार करने की योजना बनाने लगे। शिवाजी की विजयगाथा की शुरुआत रोहिदेश्वर दुर्ग से हुआ। 

सम्राज्य विस्तार 


रोहिदेश्वर दुर्ग पर छत्रपति शिवाजी महाराज ने आसानी से अधिकार कर लिया। उसके बाद तोरणा तथा कोंडाणा दुर्ग पर भी कब्ज़ा  कर लिया। शिवाजी को अच्छी तरह पता था की आदिलशाह को जब पता चलेगा की उसका दुर्ग पर कोई कब्ज़ा कर लिया है तो जरूर इस दुर्ग हो हथियाने के लिए आक्रमण करेगा और अभी शिवाजी की सेना आदिलशाह की सेना का सामना करने को तैयार नहीं थी।

इसलिए शिवाजी ने आदिलशाह के दरबारिओं को रिस्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया और आदिलशाह को ये सन्देशा भिजवाया - अगर आप मेरे शासन को अपनी स्वीकृत दे देते है तो मैं पहले के किलेदार से ज्यादा बेहतर रकम आपको दूँगा। आदिलशाह को जब ये संदेस मिला तो वो गुस्सा से तमतमा गया। 

शिवाजी ने जिन दरबारिओं को रिश्वत खिलाई थी वो आदिलशाह को समझाने लगे हमे रकम के बारे में सोचना चाहिए वैसे भी वो किलेदार हमारे लिए सिर्फ मोहरे ही तो थे और शिवाजी उनसे कही ज्यादा योग्य है और इनके पिता तो ऐसे ही आपके यहाँ सेवादार है तो शिवाजी कभी भी आपसे गद्दारी नहीं करेगा। काफी सोच विचार करने के बाद आदिलशाह मान गया।   

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छत्रपति शिवजी महाराज 

छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने दुर्ग को मज़बूत करने में लग गए। अपनी सेना और सम्पति अर्जित कर अपने राज्य को मजबूत करने लगे। असल में शिवाजी का अगला निशाना राजगढ़ था। शिवाजी के किले से कुछ ही दुरी पर बसा राजगढ़ दुर्ग पर शिवाजी ने सही मौका देखकर आक्रमण कर दिया। कुछ ही दिनों पर राजगढ़ दुर्ग पर शिवाजी का कब्ज़ा हो गया।

छत्रपति शिवाजी की साम्राज्यविस्तार नीति का जब आदिलशाह को पता चला तो वो आग-बगुला हो उठा। शिवाजी महाराज के पिता को दरबार में बुला कर आदेश दिया की अपने पुत्र पर नियन्त्र रखे नहीं तो इसका गंभीर परिणाम आपको भुगतने होंगे। शाहजी भोंसले ने आदिलशाह को अश्वासन दिया की भविष्य में ऐसी कोई गलती नहीं होंगी। 

शिवाजी ने आदिलशाह के धमकी को नजरअंदाज करते हुए अपने पिता के अधिकारक्षेत्र वाले दुर्ग सहित और भी कई दुर्ग को भी अपने कब्जे में कर लिए और आदिलशाह को रकम भेजना भी बंद कर दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज के इस गुस्ताखी से आदिलशाह इतना नाराज हुआ की उसने शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को बंधक बना लिया।

शिवाजी को समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया। अगले सात सालो तक शिवाजी महाराज ने आदिलशाह पर कोई हमला नहीं किया। इन सात सालो को शिवाजी महराज ने व्यर्थ नहीं जाने दिया। इस समय में अपनी सेना को मजबूत करने, विदेशी राजाओ से सम्भन्ध सुधारने की कोशिश की। धीरे-धीरे अपने सम्राज्य में बड़ी विशाल सेना बना ली।  शिवाजी के घुडसवार सेना को सेनापति नेताजी पलकर थे तथा पैदल सेना के सेनापति यशजी कंक थे। सन 1657 तक छत्रपति शिवाजी महाराज के पास 40 दुर्ग हो चुकी थी। 

छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर सन 1659 में बीजापुर के बड़ी साहिबा ने अफगान सरदार अफ़ज़ल खान को सवा लाख सैनिकों  के साथ शिवाजी पर आक्रमण के लिए भेजा। अफजल खान एक क्रूर अफगान सरदार था उसने रास्तें में आने वाले सभी मंदिरों को तोड़ना आरम्भ किया तथा बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों की हत्या करने लगा।

इस हरकत के पीछे अफजल खान की सोची समझी चाल थी क्योकि शिवाजी महाराज गोरिल्ला युद्ध से युद्ध करते थे और अफजल चाहता था की वो इस विशाल सेना से खुलयाम टकराए। लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने युद्ध कला कौसल का परिचय देते हुए छापामार युद्ध किया जिससे अफजल खा के पैर उखड़ने लगे। 

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अफ़जल खान की हत्या

अफ़ज़ल खान अपने हाथों से जीत फिसलता देखा एक षडयंत्र रचा। उसने संधि के बहाने शिवाजी को अपने यहाँ मिलने बुलाया। अफजल खान की लम्बाई चौड़ाई छत्रपति शिवाजी से लगभग डेढ़ गुना अधिक थी। संधि के वक़्त जाते समय शिवजी महाराज के दरबार के सदस्य गोपीनाथ और कृष्णा भास्कर ने शिवाजी को आगाह किया की ये कोई साजिस भी हो सकती है इसलिए सुरक्षा दृस्टि से अपने साथ कुछ हथियार ले जाए।

जैसा की पहले से आशंका थी ठीक वैसा ही हुआ अफजल खां ने शिवाजी को गले मिलने के बहाने अपने बाहुपाश से जकड़ कर मारना चाहा, शिवाजी ने अपने बचाव में अपने साथ लाए हथियार वस्त्रो वाघनेखो से अफजल खा के पेट चीर डाले। अफजल खां के मृत्यु के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने पन्हाला दुर्ग, पवन दुर्ग तथा वसंतगढ़ दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। 

अफजल खा के मृत्यु से बीजापुर की सल्तनत सन्न रह गई । बीजापुर की बड़ी बेगम ने शिवाजी पर आक्रमण करने के लिए रुस्तम खां को एक बड़ी सेना के साथ रवाना किया। 28 दिसंबर 1659 में शिवाजी महाराज ने रुस्तम की सेना पर सामने से आक्रमण बोल दिया साथ में शिवाजी के सेना ने दो टुकड़ियों ने दो तरफ से आक्रमण कर दिया। जिससे रुस्तम खान बुरी तरह परास्त हो गया। इसके साथ ही छत्रपति शिवजी महाराज ने राजापुर और दाबुल के दुर्ग पर भी कब्ज़ा कर लिया। 

रुस्तम जमाल  के परास्त  होने के बाद बीजापुर में हड़कंप मच गया। सन 1660 ईस्वी में बीजापुर के सेनापति सिद्दी जौहर को शिवाजी महाराज पर आक्रमण करने को भेजा। इस वक़्त छत्रपति शिवजी पन्हाला किले में थे। सिद्दी जौहर की विशाल सेना ने पन्हाला के दुर्ग को चारों तरफ से घेर लिया। कोई उपाय नहीं देख शिवाजी महाराज ने सिद्दी जौहर को मिलने का न्यौता दिया। सिद्दी जौहर जैसे ही शिवाजी महाराज से मिलने आया ठीक उसी वक़्त ऐसा अफवाह उड़ा दी गई की सिद्दी जौहर बीजापुर से गद्दारी कर रहा। अब बीजापुर और सिद्दी जौहर के बीच युद्ध छिड़ गया।

इसी का फायदा उठाते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज एक रात अपने 5000 सैनिकों के साथ पन्हाला किले से बाहर निकल आये। बाजी प्रभु देशपांडे ने अपने युद्ध कौशल का परिचय देते हुए सिद्दी जौहर के सैनिको को उलझाए रखा जिसके कारण शिवाजी महाराज वहाँ से निकलने में सफल हुए। इस युद्ध में बाजी प्रभु देशपांडे को वीरगति प्राप्त हुई। सन 1662 में बीजापुर और छत्रपति शिवाजी से समझौता हुआ  इस संधि के अनुसार बीजापुर के सल्तनत ने शिवाजी की स्वन्त्र शासक मान लिया। इस संधि से छत्रपति शिवाजी महाराज का अधिकारक्षेत्र उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोंडा तक पूर्व में इंदापुर से पश्चिम में दाबुल तक हो गया। 

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शिवाजी महाराज अपने राजदरबार में 

मुगलों से युद्ध 


बीजापुर के बड़ी बेग़म ने औरंगजेब से शिवाजी को पकड़ने की विनती की। अभी तक औरंगजेब पूरी तरह से मुगलिया सत्ता पर कब्ज़ा जमा चूका था। औरंगजेब का शिवाजी से पहले सामना हो चूका था। सन 1656 ईस्वी में औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था। 1 नवम्बर 1656 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके कारण पुरे बीजापुर में अराजकता फ़ैल गई। इसी मौके के इंतजार में दक्कन का सूबेदार औरंगजेब बैठा हुआ था। उसने बीजापुर पर हमला बोल दिया।

औरंगजेब अपनी क्रूरता का परिचय देते हुए बीजापुर में भारी लूटमार मचाई। जब औरंगजेब की सेना लूटमार के सम्पत्ति के साथ लौट रहे थे तब शिवाजी ने अपनी सेना के साथ चुन्नार नगर के पास धावा बोल दिया। बीजापुर में युद्ध करके औरंगजेब की सेना काफी थकी हुई थी जिसके कारण वो शिवाजी की सेना ने आसानी से बीजापुर से लुटे हुए सम्पत्ति को आसानी से लूट लिया। इसके अलावा शिवाजी महाराज ने मुगलों के कब्जे वाली गुण्डा और रेसिन दुर्ग में भी भारी लूटमार की।

जब औरंगजेब को इस लूटमार के बारे में खबर मिली तो वो काफी क्रोधित हो गया। लेकिन उसी वक्त शाहजहाँ की बीमारी की खबर मिली। मुगलों में उत्तराधिकारी बनने की होड़ मची थी। इसलिए औरंगजेब दिल्ली के लिए कूच कर गया और वहाँ शाहजहाँ को बन्दी बनाकर मुगलिया सल्तनत का उत्तराधिकारी बन गया। 

औरंगजेब ने बड़ी बेगम को शिवाजी के भय से मुक्त कराने का वचन दिया। औरंगजेब सम्पूर्ण भारत पर अपना अधिपत्य स्थापित करना चाहता था इसलिए उसने दक्षिण का सूबेदार अपने मामा शाइस्ता खां को बनाया। शाइस्ता खान एक विशाल सेना के साथ सुपन और चाकन दुर्ग पर कब्ज़ा करते हुए पुणे पहुँच गया। उसने लगभग तीन सालों तक मावल में लूटमार की।

शिवाजी महाराज ने धैर्य के साथ सही वक़्त का इंतजार किया और एक रात 350 मावल सैनिक साथियों के साथ शाइस्ता खां के सेना में बारातियों के भेष में घुस गए। मौका पाते ही शिवाजी ने शाइस्ता खान पर हमला कर दिया। शाइस्ता खां को सम्भलने का मौका भी न मिला। अपनी जान बचाकर खिड़की से शाइस्ता खान भागने लगा लेकिन छत्रपति शिवाजी के प्रहार से शाइस्ता खा के चार अँगुलिया कट गई। शिवाजी की सेना ने शाइस्ता खां की सेना में जबरदस्त मार काट मचाई जिसके कारण सेना में त्राहिमाम मच गया और मुग़ल सेना वहाँ से भाग खड़ा हुई। 


छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत में मचाई कोहराम 


शाइस्ता खान पर शिवाजी की विजय ने मराठों के हौसले बुलंद हो गए थे। शाइस्ता खान ने लगभग 1,50,000 सेना के साथ शिवाजी के साम्राज्य में 6 साल तक लूटमार की थी जिससे मराठा साम्राज्य को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। शिवाजी ने मराठा साम्राज्य को हुए नुकसान की भरपाई करने की ठानी और मुगलों की व्यापार मुख्य केंद्र माने जाने वाली सूरत शहर पर आक्रमण कर दिया।

सूरत एक समृद्ध शहर था तथा बंदरगाह होने के कारण हिंदुस्तानी मुसलमान का हज जाने का द्वार सूरत ही था। लगभग 4000 सैनिकों के साथ शिवाजी ने छः दिनों तक सूरत में लूटमार मचाई। लेकिन छत्रपति की सेना ने आम नागरिकों को छुआ तक नहीं। 


मुगलों से सन्धि 


सूरत में लूटमार की खबर जब औरंगजेब को पता चली तो वो काफी क्रोधित हुआ उसने शिवाजी को परास्त करने के लिए एक संगठन बनाया क्योकि उसे पता था की छत्रपति शिवाजी महाराज को अकेले हराना संभव नहीं। सबसे पहले गयासुद्दीन खान को सूरत का सूबेदार बना के भेजा और इसका साथ देने के लिए राजा जसवंत सिंह, राजा जयसिंह और दिलेर खान को भेजा। एक बहुत बड़ी सेना के साथ शिवाजी के दुर्ग को घेर लिया गया।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने इतने बड़ी सेना के साथ भीड़ कर अपनी सेना को जान-माल की छती नहीं पहुँचाना चाहते थे इसीलिए शिवाजी महाराज ने मुगलों से संधि कर ली। जून 1665 में हुए इस संधि में शिवाजी को मुगलों को 23 दुर्ग देने पर गए, इसके अलावा हर्जाने की एक बहुत बड़ी रकम अदा करनी पड़ी। इतना  ही नहीं मुगलों ने शिवाजी को नियंत्रण में रखने के लिए उनके पुत्र शम्भाजी को औरंगजेब के दरबार में रहना पड़ेगा। 


मुगलों का विश्वासघात 

छत्रपति शिवाजी को आगरा के दरबार में आने का निमंत्रण दिया गया। यह निमंत्रण शिवाजी महाराज को नीचा दिखाने  की एक साजिस थी। शिवाजी महाराज को छोटे सामंत के साथ खड़ा रहने को कहा गया। उचित सम्मान नहीं मिलने के कारण शिवाजी ने विरोध जताया तथा सभा का बहिष्कार किया। औरंगजेब को इसी वक़्त का इंतजार था उसने शिवाजी को बंदी बनाने का आदेश दे दिया।

शिवाजी महाराज को उनके पुत्र के साथ एक किले में नजरबन्द कर दिया और 5000 सैनिको का पहरा किले पर बैठा दिया। असल में औरंगजेब का इरादा किले में ही शिवाजी की हत्या की थी लेकिन मौका पाकर शिवाजी महाराज अपने पुत्र के साथ वहां से फरार हो गए।

 02 सितम्बर 1666 को छत्रपति शिवाजी महाराज अपने साम्राज्य रायगढ़ पहुंच गए। छत्रपति शिवाजी के लौटने से मराठों में जान आ गई। दुगने जोश के साथ मराठा सैनिको ने संधि में खोये दुर्गो पर हमला करने लगे। इनका हमला इतना जोरदार होता था जैसे मानो मुगलों से अपनी हर अपमान का बदला ले रहे हो। औरंगजेब को शिवाजी के फरार कराने का शक राजा जयसिंह पर था उसने जयसिंह के खाने में विष मिलवा के मार डाला। 

मराठा सेना एक के बाद एक दुर्ग को जीतते जा रहे थे साथ ही मुगलो की सेना में भयानक मार काट मचा  रहे थे। लाचार होकर औरंगजेब छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ दूसरी बार संधि के लिए मजबूर हो गया। पहली संधि में लिए गए जितने भी दुर्ग थे उसे औरंगजेब ने मराठों को लौटा दिया। शिवाजी महाराज को औरंगजेब ने राजा की मान्यता भी दे दी।  

मुगलों के संधि के बाद शिवाजी महाराज के प्रतिष्ठा में काफी इजाफा हुआ। मराठा अब किसी के रोकने से रुकने वाले नहीं थे। शायद उनका अपमान का बदला अभी पूरा नहीं हुआ था। सन 1670 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक बार फिर सूरत पर हमला बोल दिया और इस शहर को दूसरी बार अपने पैरो के तले रौंद दिया। इतना ही नहीं सूरत से लौटते वक़्त मुगलो की सेना को एक बार फिर पराजित किया। 


छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक 

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सन 1674 ईस्वी में पश्चिम महाराष्ठ्र को स्वंत्रत हिन्दू राज्य की स्थापना की और अपना राज्याभिषेक कराया। 04 अक्टूबर 1674 को शिवाजी महाराज ने "छत्रपति" की उपाधि धारण की। इस समारोह में देश-विदेश के राजा, दूत तथा व्यापारी आमंत्रित किये गए। एक अनुमान के कारण इस समारोह में लगभग 50 लाख खर्च हुए थे। शिवाजी महाराज ने अष्ट प्रधान मंडल की स्थापना की। इस समारोह में छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्द स्वराज का नारा दिया। महाराष्ट्र, विजयनगर के बाद दक्षिण में पहला हिन्दू साम्राज्य था। शिवाजी ने अपने नाम का सिक्का भी चलाया।

स्वतंत्रता एक वरदान है, जिसे पाने का अधिकार सभी को है - छत्रपति शिवाजी महाराज  

दक्षिण पर चढाई 

छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के बाद दक्षिण भारत की तरफ ध्यान दिया। बीजापुर के सुल्तान के दो सेनापति को हारने के बाद कर्नाटक पर शिवाजी ने धावा बोल दिया। मैसूर, वैलारी, कोंकण, जिंजी, तथा धारवाड़ पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। अब मराठा साम्राज्य पश्चिम से दक्षिण तक फ़ैल चूका था। 

शिवाजी की मृत्यु 

मार्च 1680 में शिवाजी को बुखार ने भयानक चपेट में ले लिया। शिवाजी को ठीक करने के लिए बहुत कोशिश की गई। अन्तत छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु 03 अप्रैल 1680 को हो गई। भारतमाता का महान सुरवीर योद्धा अपनी धरती माँ के आँचल में सदा के लिए सो चूका था। 

शिवाजी सिर्फ एक नाम नहीं तूफान था जिसने मुगलिया सल्तनत की निवे हिला दी थी। बीजापुर साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी थी। मराठों का ये मानना था जब तक शिवाजी की तलवार चलती रहेगी तब तक उनके घर स्त्री सुरक्षित रहेंगी इसलिए वो उनके लिए जान देने से भी नहीं हिचकते थे।भारत माँ की आन, मराठों की शान  छत्रपति शिवाजी महाराज स्वराज्य के पुजारी थे। ऐसे योद्धा को यह भारत की धरती हमेशा नमन करती रहेगी। 


!! जय हिन्द ! जय शिवाजी  !!

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